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उड़ीसा के पूरी समुद्र तट के किनारे एक सेंड आर्टिस्ट सुदर्शन पटनायक ने ने मिस वर्ल्ड 2017 मानुषी छिल्लर के लिए रेत से कलाकृति बनाकर बधाई दी हैं .

रेत से कलाकृतियां बनाने में माहिर  सुदर्शन पटनायक ने विश्व सुंदरी का खिताब जीतने वाली मानुषी छिल्लर  का चेहरा पूरी तट पर  उकेरते हुए आकृति बनाकर शुभकामनाएं दी. सुदर्शन ने टि्वटर पर यह आकृतियां साझा करते हुए लिखा, ‘‘मानुषी छिल्लर को विश्व सुंदरी 2017 का खिताब जीतने पर बधाई देने के लिए पुरी तट पर मेरी रेत कला. भारत को तुमने गौरवान्वित किया.’’ समुद्र तट पर बनाई आकृतियों में मानुषी छिल्लर का चेहरा नजर आ रहा है और उनके सिर पर विश्व सुंदरी का ताज सजा है. सिर के पीछे तिरंगा बना है. चेहरे के पास अंग्रेजी में लिखा है बधाई हो मानुषी छिल्लर और नीचे विश्व सुंदरी 2017 लिखा है.


17 वर्षों के बाद मिस वर्ल्ड 2017 का ख़िताब जीतने वाली मानुषी छिल्लर के सरनेम का मजाक उड़ाने के बाद कांग्रेस नेता शशि थरूर लोगो के निशाने पर आ गए।

दरअसल शशि थरूर ने ट्वीट किया कि करेंसी का विमुद्रीकरण गलती थी,भाजपा को ये एहसास होना चाहिए कि भारत का कैश दुनिया पर राज करता हैं,यंहा तक कि हमारी चिल्लर भी मिस वर्ल्ड बन गयी हैं।

थरूर के इस ट्वीट के बाद सोशल मीडिया पर उनकी काफी आलोचना हुई।राष्ट्रीय महिला आयोग ने इसे मानुषी छिल्लर की जीत का अपमान बताते हुए थरूर से माफी मांगने को कहा है।वंही अभिनेता अनुपम खेर ने कहा कि आपका स्तर इतना क्यों गिर गया हैं।
हालांकि बाद में थरूर ने माफी मांग ली। 

मिस वर्ल्ड 2017  मानुषी छिल्लर ने कर दी कांग्रेस नेता शशि थरूर की बोलती बंद 

शशि थरूर के इस ट्वीट के जवाब में मानुषी ने सोमवार को चुप्पी तोड़ते हुए लिखा, ‘अभी-अभी दुनिया जीतने वाली लड़की इस एक मजाकिया ट्वीट की वजह से अपसेट नहीं होगी। ‘चिल्लर’ पर बोलना एक छोटा सा बदलाव है और भूलों मत ‘छिल्लर’ के साथ ‘चिल’ लिखा था’। मानुषी का ये ट्वीट लोगों को काफी पसंद आ रहा है। लोग लिख रहे हैं कि आपने तो शशि थरूर की बोलती ही बंद कर दी।

एसोचैम इंडिया ने अपने सदस्यों की प्रतिक्रिया के आधार पर मूल्यांकन कर अपने अध्ययन में कहा है कि आगामी वर्ष 2018-19 में भी निजी क्षेत्रों में भर्तियों में गिरावट का दौर जारी रहेगा।

एसोचैम ने अपने अध्ययन से बताया कि फिलहाल निजी क्षेत्र की कंपनियां अपना जोर कर्ज घटाने,संगठित होने,गैर प्रमुख उधोग से निकलने,बैलेंस शीट को हल्का और मजबूत बनाने में लगा रही है।

अगली डेढ़ तिमाहियों तक ये दौर जारी रह सकता है।

कंपनियां अपने मार्जिन में सुधार और ऋण की लागत को कम करने में व्यस्त होगी,यंहा तक कि शीर्ष कंपनियों की वृद्धि दर भी प्रभावित होगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन परिस्थितियों में कम से कम दो तिमाहियों तक नयी भर्ती की संभावना नहीं दिख रही।

राजस्थान सूचना आयोग का बड़ा फैसला, अब भर्तियों में सफल अभ्यर्थियों के जान सकेंगे व्यक्तिगत प्राप्तांक
राजस्थान सूचना आयोग ने प्रदेश में सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता लाने के लिए एक महत्वपूर्ण दिशा निर्देश जारी किए है।


जयपुर। राजस्थान सूचना आयोग ने प्रदेश में सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता लाने के लिए एक महत्वपूर्ण दिशा निर्देश जारी किए है। इसमें कहा गया है कि सूचना का अधिकार के तहत भर्ती परीक्षा में चयनित अभ्यर्थियों के प्राप्तांकों की सूचना तृतीय पक्षकारों की सूचना बता कर देने से इनकार नहीं किया जा सकता।

आयोग ने कहा कि इससे चयनित अभ्यर्थियों की निजता भंग नहीं होती बल्कि भर्ती परीक्षा में पारदर्शिता रखने के लिए अंतिम चयनित अभ्यर्थियों के प्राप्तांक स्वैच्छिक रूप से सार्वजनिक करने चाहिए। आयोग ने राजस्थान लोक सेवा आयोग को निर्देश दिए हैं कि अभी प्रक्रियाधीन एवं भविष्य में आयोजित सभी परीक्षाओं में अंतिम चयनित अभ्यर्थियों की सूची राज्य सरकार को भेजने के साथ ही इन अभ्यर्थियों के लिखित एवं साक्षात्कार के अन्तिम प्राप्तांक आयोग की वेबसाइट पर सार्वजनिक करें। राज्य सूचना आयुक्त आशुतोष शर्मा ने गत दिनों जयपुर के अरूण जोशी की द्वितीय अपील पर यह महत्वपूर्ण आदेश दिया है।

जोशी ने फरवरी 2016 में सहायक अभियन्ता भर्ती में चयनित अभ्यर्थियों के लिखित व साक्षात्कार के प्राप्तांकों की सूचना चाही थी। आरपीएससी ने यह कहते हुए सूचना देने से इनकार कर दिया कि यह सूचना तृतीय पक्षकारों की व्यक्तिगत सूचना है जिसे दिए जाने से अन्य अभ्यर्थियों की निजता भंग होगी। आयोग ने अपने फैसले में आरपीएससी के इस तर्क को नहीं माना।

सूचना आयुक्त आशुतोष शर्मा ने कहा कि भर्ती में असफल अभ्यर्थियों को यह जानने का हक है कि अपने प्रतिस्पर्धियों से वे कहां पिछड़े। सफल अभ्यर्थियों के प्राप्तांक सार्वजनिक होने से उनकी निजता भंग नहीं होगी बल्कि यह सार्वजनिक विषय है न कि व्यक्तिगत। आयोग ने निर्देश दिए कि सरकारी भर्ती में नौकरी पाने वाले अभ्यर्थियों के प्राप्तांकों की सूचना पारदर्शिता व व्यापक जनहित में सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 4 (2) के तहत सार्वजनिक की जानी चाहिए।

अब आएगी पारदर्शिता

गौरतलब है कि भर्ती परीक्षाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठने और अनेक न्यायिक विवादों के बावजूद आरपीएससी अब तक भर्ती परीक्षाओं में चयनित अभ्यर्थियों के प्राप्तांकों की सूचना व्यक्तिगत बता कर अन्य अभ्यर्थियों को नहीं देती थी। अभ्यर्थी स्वयं के प्राप्ताकों की सूचना प्राप्त कर सकता था। राजस्थान सूचना आयोग के ताजा निर्णय से आरपीएससी को सभी सफल अभ्यर्थियों के लिखित व साक्षात्कार के प्राप्तांकों की सूचना सार्वजनिक करनी होगी जिससे कोई भी व्यक्ति देख कर विश्लेषण कर सकेगा। इससे भर्तियों में पारदर्शिता आएगी।

आरटीआई का होगा असर

भर्ती परीक्षाओं में असफल हुए हजारों अभ्यर्थियों में से बड़ी संख्या में अभ्यर्थी आरटीआई के तहत आवेदन कर आरपीएससी से प्राप्तांकों की सूचनाएं मांगते हैं जो उन्हें नहीं मिल पाती। सूचना आयोग के ताजा आदेश से इन अभ्यर्थियों को राहत मिलेगी।

स्रोत- राजस्थान पत्रिका 20नवंबर 2017


लेखक - हरी सिह जी भाटी (गजनी से जैसलमेर बुक) के हवाले से केसरी सिंह सूर्यवंशी ने  लिखा हैं  रानी पद्मिनी जैसलमेर के रावल पूनपालजीकी राजकुमारी थी,रावल पुनपाल जी को  सन् 1276 ई. से वहां से निर्वासित कर दिया गया था और जिन्हें अपना शेष जीवन मरुस्थल की वीरानी से बिताने के लिए बाध्य होना पडा. इन्ही के पढ़पौत्र राव रणकदेव ने सन् 1380 में  थोरियों से पूगल जीतकर भाटियों का एक नया स्वायत्तशासी राज्य पुगल स्थापित किया जो कि वर्तमान बीकानेर में हैं .


इतिहास प्रसिद्ध प्रेमाख्यान की नायिका, मरवाणी भी पूगल के पाहू भाटियों की राजकुमारी थीं.समय व्यतीत होने के साथ "पूगल री पद्मिनी' दिव्य सौंदर्य का पर्यायवाची बन गई और पूगल क्षेत्र के भाटियों की सभी बेटियों की सामान्य पदवी पूगल री पद्मिनी हो गई,आज भी यह परम्परा यथावत है.

यह एक सुप्रसिद्ध तथ्य था कि पूगल संभाग की कन्याएं वहुत सुन्दर, व्यवहारकुशल, सुडौल,सुगठित देह और तीखे नाक नक्श वाली होती थीं.जहॉ विवाह के पश्चात् नए घर की यथा कला व्यवस्था करने में वह चतुर होती थीं, वहाँ उनमें पति का अगाध प्यार प्राप्त करने की कुशलता के साथ साथ वह पूरे परिवार को स्नेहपाश में बाँध लेती थीं और परिवारजन भी बदले में उससे भी अधिक स्नेह देते थे.

पानी की कमी, साधनों का अभाव, जीवन के लिए जीवट से संघर्ष से उनमें मितव्ययता, भाग्यवादिता और निर्मीकता के गुणु आत्मसात् होते थे.

उनके आकर्षक चेहरे-मोहरे, तीखी आकृति हलके-फुलके अनुपात में देह का मॉठल गठन का मुख्य कारण, उजवेगिस्तान (बोखारा), ईरान, कश्मीर, अफगानिस्तान और उत्तर-पश्चिम सीमान्त प्रान्त से उनका प्राचीन भौगोलिक संबंध व  सम्पर्क होना रहा था. उन क्षेत्रों की अपेक्षाकृत ठंडी जलवायु से गोरा रंग, गुलाबी गाल व होठ होना स्वाभाविक वा, किन्तु जब पूगल क्षेत्र की उष्ण व खुश्क जलवायु से इसका शताब्दियों तक मृदु सम्मिश्रण होता रहा तो उनकी सुन्दरता से चार चाँद जुड़ गए .

केवल यही नहीं कि इस क्षेत्र की कन्याएँ सुन्दर, आकर्षक व सुडौल होती थी पूगल क्षेत्र की 'राठी' नस्ल की गाएँ भी उष्ण व खुश्क जलवायु और वातावरण के प्रभाव से अछूती नहीं रहीँ, उनका गठन, डीलडौल, रंग, चालढाल व दूध देने की क्षमता अन्य संभागों से अब भी इक्कीस है .यह सब रेतीली उपजाऊ मिट्टी, अत्यंत उष्ण व शीत जलवायु,शांत व सामान्य खाना-पीना एवं सहिष्णुता की देन थे.
 जब भाटियों के बेटे बेटियो के वैवाहिक सम्बंन्ध पश्चिम के सिन्ध और पंजाब प्रदेशों के बजाय पूर्वी व् दक्षिणी पडोसियों से होने लगे तो इनकी पुत्रियों के शारीरिक गुणों का जहाँ हास हुआ, वहाँ भाटी माताओं से अन्य राजपूतों की संतानों के शारीरिक गुणों में शोभनीय अभिवृद्धि हुई.

अगर हम प्राचीन इतिहास काव्य और साहित्य पर दृष्टि डाले तो पाएंगे कि रानी पद्मिनी के माता -पिता और उनकी जाति व् कुल को अनावश्यक,विवाद का विषय बना दिया गया है मेवाड़ की रानी के जीवंत की यथार्थता पर सभी सहमत थे, परन्तु कोई भी राजपूत जाती उसे अपनी बेटी मानने को उद्धत नहीं हुई, क्योंकि सभी अपनी स्वनिर्मित हींन भावना के कारण उसकी सुंदरता व् नाम से अकारण घबराते थे .

 उनके अन्तः करण में कहीं न कहीं यहः  भावना  गहरे बैठी हुयी थी की ऐसी पद्मिनी पूगल के सिवाय और कहीं कि कैसे हो सकती थीं .पूगल के भाटियों की विवशता यहः थी कि कुल मिलाकर यह अनपढ़ थे .उनका अपना लिखित कोई इतिहास न था ,और परिस्थतिवश उन्होंने अपने आपको रेगिस्तान के सुरक्षात्मक  एकान्त में समेट लिया था.कोई भी निश्चित मौखिक कथन पर विश्वास करने या ध्यान देने को तत्पर  नहीं होता था.

 ऐसा कोनसा अभागा वँश होगा जो पद्मिनी बेटी जैसी दिव्य शोधा,गुणों की खान और बलिदान की प्रतिमूर्ति को अपनी पैतृक  वँश परम्परा में जोड़कर गौरवान्वित  नहीं होगा. पूगल के इतिहास से अल्प परिचित अनभिज्ञ इतिहासकारों ने पद्मिनी को कहीं न कहीं अपनी पसन्द की खाँप या जाति की उपयोज्यता बना दीं,ओर अगर संयोगवश वह उसके वंश और खानदान की सही पहचान करने में सफल नहीं हुए तो उन्होंने उसके अस्तित्व पर पूर्णवुराम लगाकर इतिश्री का दी .

तवारिख जैसलमेर और जैसलमेर री ख्यात के अनुसार रावल पुनपाल जी के तीन रानियां थी: (1) रानी पैपकंवर पडिहारजी यह बेलवा के राणा उदयराज की पुत्री थी ,इनसे लखमसी भोजदेव, दो राजकुमार हुए. पुगलिया या पुंगली भाटी भोजदेव के वंशज हैं. (2 ) सिरोही की राणी जामकंवर देवडी, इनके चरड़ा और लूणराव, दो राजकुमार हुवे ,इनके वंशज क्रमश:चरडा और लूँनराव भाटी है. इन रानी की पुत्री राजकुमारी पद्मिनी थी .(3)थर-पारकर के राणा राजपाल की पुत्री सोढी रानी इनके पुत्र रणधीर के वंशज रणधीरोत भाटी हैं .

पूनपालजी द्वारा सन् दृ 1276 ई. में जैसलमेर त्यागने के पश्चात् उनकी रानी जामकँवरं देवडी (चौहाँन) के सन 1285 है से राजकुमारी पद्मिनी ने जन्म लिया.इनका विवाह चितोड़ के रावल रतनसिंह के साथ हुआ था. रानी जामकंवर देवडी नाडोल से जालोर आये देवडो की पुत्री थी.जालोर के चौहान शासकों का विस्तृत राज्य था.जामकेंवर देवडी के पिता वर्तमान जालोर राज्य के सामंत थे.

'जायसी ग्रंथावली', पृष्ठ 24 पंडित रामचन्द्र शुक्ल ने रानी पद्मिनी के पति का नाम रत्नसिंह (या रतन सेन) दिया है, यहीं नाम आइन-ई-अकबरी में दिया गया है । कवि जायसी ने भी शासक का नाम रतनसी दिया है. पंडित शुक्ल के अनुसार (वर्तमान) राजपूताना या समीप के गुजरात में "सिंघल" नाम का छोटा राज्य होना चाहिए था . सिरोही राजस्थान और गुजरात की सीमा' पर है. श्रीलंका में चौहानो का कोई उपनिवेश नहीं था. श्रीलंका के निवासी कभी गोरे नहीं होते थे, इसलिए राजकुमारी पद्मिनी जैसी सुंदर कन्या वहां की संतान नहीं हो सकती .सिंघल द्वीप और वहाँ की पद्मिनु केबल गोरखपंधी साधुओं की कल्पित कथा है .

"सोनगरा सांचोरा चौहानों का इतिहास', पृष्ठ 45, मैं हुकमसिह भाटी, गोरा और बादल जालौर के सोनगरा चौहान थे , गोरा, बादल के चाचा थे . चितौड़ आने से पहले यह गुजरात के शासक, वीसलदेव सोलंकी के प्रधान थे .

इनकी भानजी का विवाह चितौड़ होने के बाद इनके मामा गोरा और ममेरा भाई बादल,सोलंकियों की सेवा छोडकर चितौड़ आ गए थे.

विद्वान पंडित रामचन्द्र शुक्ल ने थोडी भूल कर दी है .रानी जामकैवर देवडी, देवड़ा चौहानों के अधीन राजस्थान से लगती गुजरात सीमा में सिंहलवाडा संभाग की थीं. रानी जामकेंवर देवडी के भाई गोरा, रानी पद्मिनी के मामा थे और बादल उनके ममेरे भाई. क्योकि गोरा और बादल रानी पद्मिनी के ननिहाल से थे, इसलिए सन् 1303 ई. के चितौड़ के जोहर से पहले उन्होंने मर्यादा सम्बन्धित मार्गदर्शन अपने ननिहाल पक्ष से भी लिया था .

नाडौल के देवडा गुजरात के सोलंकी शासकों के प्रधान सामन्त थे और लंबे समय तक उनकी सेवा में रहे. आसराज चौहान ने इन देवड़ा वंशजों के पास सिंहलवाडा की जागीरी थी. इसलिए राजा देवडा हमीरसिंह की पुत्री राणी जमकंवर देवड़ी इसी सिंहलवाड़ा से थी .कवि जायसी ने सिंहलो की भूमि सिंहलवाड़ा को कल्पना से 'सिंहल द्वीप’ की संज्ञा देकर अर्थ का अनर्थ कर दिया सम्भवतः पूर्वी भारत में दूर बैठे जायसी को उस काल में सिंहलवाड़ा के अस्तित्व का बोध तक नही था.उन्होंने पद्मिनी और सिंहल देश का नाम सुनकर या कही पढ़कर सिंहल द्वीप की उड़ान भर ली और इसी भ्रम  में मौज से पद्मावत काव्य की भूमिका बुनकर ऐतिहासिक काव्य की रचना कर डाली. कवि के भ्रमात्मक आधार ने पद्मिनी के सही अस्तित्व को सदियों तक उल्झाये रखा.

वस्तुस्थिति यह रही कि रावल पूनपालजी की रानी जामकेंवर देवडी  सिंहलवाडा के राजा हमीरसिंह्र देवडा की पुत्रो थी .  इनके राजकुमारी पद्मिनी हुई, जिनका विवाह मेवाड़ के रावल रतनसिंह के साथ हुआ. हमीर देवड़ा पद्मिनी के नाना थे. पद्मिनी के मामा गोरा चौहान और इनका भतीजा बादल, पहले गुजरात के सोलंकी शासकों की सेवा में थे, अपनी भानजी का विवाह मेवाड़ हो जाने के बाद वह गुजरात की सेवा छोड़कर मेवाड़ के रावल की सेवा से चितौड़ आ गए.
राजपूतों में यह परम्परा भी थी कि बहन या बेटी के पास पीहर और ननिहाल पक्ष से सरदार, पुरोहित व सेवक,सेविकाऐ अवश्य रहते थे  .ताकि नए घर में पीहर के विछोह में बेेटी उदास नहीं रहे . निकट के यहःसम्बन्धी उसके पीहर की मान-मर्यादा से उसे अवगत कराते रहते थे और संकट की घडी से उसका साथ देते थे .

सन् 1295 है से हुए जैसलमेर के पहले शाके तक राजकुमारी पद्मिनी सयानी हो चली थी.वह सुन्दर कन्या तरुणाई से प्रवेेश कर रहीं थी.शाके के बाद के दिनो से भाटी बाहुल्य प्रधान क्षेत्रो में अललाऊद्दीन खिलजी के गुप्तचरों, भेदियों की भरमार थी . पूनपालजी को चिंता थी कि कहीँ राजकुमारी के अद्भुत सौंदर्य और रूप लावण्य की सूचना सुलतान तक नहीं पहुँच जाए . और फिर,अगर सुलतान ने उनसे पद्मिनी  की माँग कर ती तो उनके  पास इस अबोध बालिका के बचाव का कोई साधन भी तो नहीं था, वापस जैसलमेर की शरण लेना पूनपालजी के प्रतिष्ठा का प्रश्न था और शाके के बाद जैसलमेर से उनका साथ देने वाला बचा ही कोन था. अगर उसकी गिद्ध निगाहों और क्रूर हवस से पद्मिनी का कुछ बचाव सम्भव नहीं हो सका तो उनके पास स्वय के हाथों पद्मिनी  का गला घोंटने या जहर देने के सिवाय कोई विकल्प शेष नहीं था.

 संभावित परिदृश्य पर विचार करके पुनपालजी ने जल्दी से पद्मिनी का राजकुमार रतनसिंह के साथ विवाह किए जाने के प्रस्ताव स्वरूप परम्परागत नारियल कुल-पुरोहित के साथ मेवाड़ के रावल समर सिम्हा के पास भेजा.पुरोहित के साथ रावल को यहः भी कहला भेजा कि राज्य से निर्वासित लिए जाने के कारण वह मेवाड़ की प्रतिष्ठा के अनुरूप दहेज़ आदि की व्यवस्था करने में असमर्थ थे. मेवाड़ के शासक उनकी व्यथा समझते ये, सारे घटनाक्रम के जानकार थे इसलिए उन्होंने पद्मिनी के राजकुमार रतंन सिंह  के साथ विवाह का प्रस्ताव तत्परता से स्वीकार कर लिया. अपनी अपेक्षाकृत पतली दशा तथा उस समय मेवाड़ की उच्च प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए पुंनपाल जी ने पद्मिनी का 'डोला‘ मेवाड़ भेज दिया विवाह की सारी रश्म रिवाज धार्मिक विधिपूर्वक चितोड़ मे की गयी . राजकुमारी पद्मिनी का जन्म सन 1285 ई में और विवाह सन 1300 ई में हुआ था .
भाटी और मेवाडी एक-दूसरे से अनजान नहीं थे, प्राचीनकाल से इनके आपस में वैवाहिक सम्बन्थ होते आए थे .रावल सिद्ध देवराज का एक विवाह राव सुरुँजमल गहलोत की राजकुमारी सरुंजकैवर रावल मुंधजी का विवाह अड़सीजी की राजकुमारी रामकंवर से रावल विजयराव लांझा जी का विवाह रावल करन समसिजियोत की राजकुमारी शिवकवर से, रावल शालिवाहन का रावल जयसिंह की राजकुमारी राजकंवर से हुआ था . मेवाड़ के प्रथम राणा राहुल, पूगल की पाहू भाटी राजकुमारी रणकदेवी के पुत्र थे. राव रिड़मल राठौड़ का एक विवाह बीकमपुर के भाटियों के यहाँ हुआ था और उनकी बहन हँसा बाई चितौड़ के राणा लाखा को ब्याही थी, जिनके पुत्र राणा मोकल थे. इस प्रकार भाटियों और मेवाडीयों के पीडी दर-पीडी आपस में वैवाहिक आदानप्रदान होते आये थे . पत्नी के चुनाव का मुख्य आधार उसके गुणु, सुन्दरता और खानदान होते थे, प्रमुख शासकीय जातियों के लिए वधू के पिता की समृद्धि गौण होती थी . जैसलमेर के भाटियों से मेवाड़ के वैवाहिक संबंध  बाद की शताब्दियों में भी यथावत वने रहे .

राजकुमार रतनसिंह पद्मिनी जैसी उत्कृष्ट सुन्दरी के रूप में पाकर निहाल हो गए ,उन्होंने अपने शुभनक्षत्रों को इसके लिए बार-बार धन्यवाद दिया, किन्तु उनका अमृतचुल्य सुख अल्पावधि का रहा. जिस दूरदर्शिता से पूनपालजी नेपुगल  के मरुदेश की अमूल्य धरोहर को अलाउद्दीन खिलजी के गुप्तचरों व भेदियों की तीखी निगाहों से बचाकर मेवाड़ व चितौड़ की अभेद्य सुरक्षा प्रदान करनी चाही थी, उनकी यह कामना पूर्ण नहीं हुई .

चितौड़ में सुलतान खिलजी के शिविर के आस पास तुच्छ पुरस्कारों के लिए मंडराते हुए मेवाडी भृत्यों ने रानी पद्मिनी के अदम्य रूप लावण्य की प्रशंसा उनके सामने कर डाली ,बस विनाश हो चुका. जिस नियति की आशंका पूनपालजी को चितौड़ से तीन सौ मील दूर पगल में थी,उसी नियति के खेल ने पद्मिनी को चितौड़ में रंग दिखाया . 

वह अट्ठारह वर्षों की नवयौवना चितौड़ के गढ में सन् 1303 ई. में अग्नि के बलि चढ़ गई,कहाँ मरुदेश के रेतीले शुष्क वातावरण में पली पोषी  पद्मिनी का भाग्य उसे "खींचकर अरावली की धाटियों में ले गया, जहाँ वह रक्त…रंजित संघर्ष का कारण बनकर स्वाह हो गई, और राजपूतों व मेवाड़ के इतिहास में पूजनीय बनकर अमर हो गई .

भाटियों को गर्व है कि पूगल की माटी बेटी रानी पद्मिनी भटियाणी ने जीवित रहने के लिए भाटियों और गहलोतों के आत्म सम्मान व स्वाभिमान से समझौता किए बिना हजारों क्षत्राणियों वृद्धा व युवा, का नेतृत्व करके उन्हें आत्मदाह का मर्यादा का मार्ग बताया.

 कहते हैं कि जौहर पद्मिनी ने अपने मामा गोरा और ममेरे भाई बादल से विचार विमर्श करके  किया था. दोनों ने मर्यादानुसार सर्वोच्च बलिदान का मार्ग चुना एक राख बन गई, दूसरों का रक्त धरती माँ की माटी ने बीज सुरक्षित रखने के लिए सोख लिया. जितना पूगल की पद्मिनी के रूप-लावण्य, साहस व् बलिदान ने भारतीय वाड्मय को प्रभावित किया है उतना अन्य किसी ने नहीं क्रिया .

 क्योकिं पद्मिनी का सौन्द्रर्यं साधारण संग्राहक की सोच-शक्ति से परे था इसलिए तथाकथित विद्वानो ने बिना सोचे-समझे, रुके, इसकी वंश-परम्परा को कहीं भी किसी के यहाँ, टाँककर एक गौरवमय इतिहास की इतिश्री कर दी. उनके लिए पूगल इतना समीप का साधारण पडोसी था कि वह पद्मिनी जैसी असाधारण रानी की जन्मभूमि हो ही नहीं सकती थी.आज्ञान, ईष्यों, जनश्रुति आदि कारणों से बाध्य होकर विद्वानों और अज्ञानियों ने पद्मिनी को ऐसी दूर जगह स्थापित करके संतोष किया ,जिसे किसी ने कभी देखा तक नहीं था, केवल उसकी स्तुति रामायण से सुनी थी .

यहाँ यह बताना सामयिक होगा कि रानी पद्मिनी से सौ साल पहले पूगल के ही पाहू घाटियों की बेटी रानी रणकदेवी मेवाड़ के प्रथम सिसोदिया राणा, राणा राहुप, की माता थीं .

पूगल क्षेत्र की सभी सुन्दर कुमारियों को ’पद्मिनी' नाम से सम्बोधित किया जाता था, उनका असली नाम चाहे कुछ और ही होता था. 'पद्मिनी जातिवाचक संज्ञा थी, न की व्यक्तिबाचक.

मंडोर के बाउक प्रतिहार शासक की भटियाणी माता को सम्मान से 'पद्मिनी' कहते थे,उनका असली नाम पद्मिनी नहीं था.

जैसलमेर के प्रसिद्ध इतिहासकार नंदकिशोर शर्मा ने पद्मावती को जैसलमेर की राजकुमारी होने का दावा किया हैं उन्होेंने इसके तथ्य भी बताए है.

शर्मा का दावा है कि पद्मावती उर्फ पद्मिनी श्रीलंका की नहीं, जैसलमेर के निर्वासित महारावल पुण्यपाल की राजकुमारी थी. सिंहल लोद्रवा के महारावल बाछू के दूसरे पुत्र सिंहराव ने सिंध के रोहड़ी वर्तमान में पाकिस्तान से 8 कोस की दूरी पर सिंहरार नामक कस्बा को भाटियों ने आबाद किया था. जैसलमेर के सेवग लक्ष्मीचंद की तवारिख पृष्ठ संख्या 26 के अनुसार सिंहरावों ने 24 गांव आबाद कर खेरात में सइयदों को दिया था, वह आज तक उनके पास है। सिंहराव भाटियों के इस कस्बे को सिहर कहा जाता था। सिहर ही सिंहल जो सिंघल के नाम से प्रसिद्ध हुआ. इस क्षेत्र पर भाटियों के पूर्वजों का अधिकार था. भाटी सिद्ध रावल देवराज ने यहां पर विक्रम संवत 909 में देरावलगढ़ और राजधानी बनाया था.

1955 में राजऋषि उम्मेदसिंह राठौड़ ने लिखा है कि राणा रतनसिंह का विवाह सिंहल देश की राजकुमारी पद्मिनी के साथ हुआ था. चित्तौड़ की माटी पर सन 1302 में रतनसिंह का विवाह पद्मिनी के साथ हुआ। पद्मिनी की मां चौहान थी पिता भाटी थे. गोरा और बादल उसके चचेरे नहीं, बल्कि ममेरे भाई थे. पद्मिनी के पिता ने मेवाड़ के चित्तौड़ राणा रतनसिंह के पिता समरसिंह की आज्ञा से डोला भेजकर रतनसिंह से पद्मिनी का विवाह किया था. पुण्यपाल निर्वासित थे ऐसी स्थिति में परम पद्मिनी का विवाह करना बड़ा कठिन हो गया था. उस समय अलाउद्दीन खिलजी हिंदू राजकुमारियों रानियों का अपहरण कर रहे थे. ऐसी स्थिति में पूंगल के सिंहल क्षेत्र के भाटियों ने डोला भेजकर पद्मिनी का विवाह 1302 ईस्वी में रतनसिंह से करवाया था.

सिरोही के चौहानों की दोहित्री थी पद्मावती 

पुण्यपालकी पुत्री उनकी दूसरी रानी देवड़ी सिरोही के चौहानों की राजकुमारी थी. उनका नाम जाम कंवर था. जैसलमेर राज्य के भाटी वंशी महारावल पुण्यपाल 1331 संवत तथा 1274 ईस्वी में जैसलमेर के राज सिंहासन पर बैठे थे. इनके पिता महारावल लखनसिंह थे। इनकी राजनैतिक अनभिज्ञता के कारण उन्हें देश निकाला हुआ. इसके बाद वे जैसलमेर के उत्तर पश्चिम में स्थित देरावर के पास इनके पूर्वजों के राज्य सिंहरार में आकर रहने लगे. इस समय यह क्षेत्र पूंगल का हिस्सा था. पृष्ठ 34 के अनुसार इनके बेटे लखनसिंह के बेटा राणगंदे ने गढ़ मारोट से पूंगल भीलों से तथा मूमण ब्राह्मण को साथ लेकर वहां के राव बने. सन 1285 में पुण्यपाल की दूसरी रानी जाम कंवर ने परम सुंदर पद्मावती को जन्म दिया. पद्मिनी पद्म कमल के समान कोमल कमल पुष्प के समान सुंदर थी. इस समय की अतिसुंदर कन्या पद्मिनी के रूप को पूगल की पद्मिनी की उपमा देकर लोगों ने सम्मान दिया. हर सुंदर नारी की उपमा बन गई और गीतों में गाई जाने लगी.

जनश्रुति के रूप में सुनते रहे है कि पद्मिनी जैसलमेर मूल की थी, इनके पिता निष्कासित होने के बाद पूंगल के राजा बने.जैसलमेर की तवारिख में भी इस बात का जिक्र है. जैसलमेर के इतिहास के कई दोहों में पद्मिनी का वर्णन है. 

 बालकृष्णजोशी, इतिहासकार ने दैनिक भास्कर समाचार पत्र को बताया कि इतिहास के आधार पर यह बात बिलकुल सही है कि चितौडग़ढ़ की रानी पद्मिनी का जैसलमेर से संबंध था, मैने अपनी पुस्तक 'स्वर्ण दुर्ग की आत्मकथा' में भी इस बात का उल्लेख किया है.जैसलमेर के संस्थापक रावल जैसल के वंशज थे पुण्यपाल जिनका विवाह सिरोही के चौहान परिवार में हुआ था. पुण्यपाल को जैसलमेर की राजगद्दी से पदच्युत कर दिया था. इसके बाद वे जगह जगह भटके उसके बाद में पूंगल पर अधिकार प्राप्त किया. इसके बाद पद्मिनी के जन्म के समय पुण्यपाल पूंगल के रावल थे. उन्हीं की बेटी पद्मिनी थी. जिनका विवाह 15 साल की आयु में चितौडग़ढ़ के रावल रतनसिंह से विवाह किया गया. चितौडग़ढ़ की रानी पद्मिनी जैसलमेर मूल के भाटियों की बेटी तथा सिंहल के पहले सामंत बाद में राजा की दोहित्री थी. जिसे पूंगल की पद्मिनी के नाम से भी जाना जाता है। पद्मिनी बेहद गुणवान और सुंदर औरत थी. औरत की सुंदरता को चार वर्णों में विभाजित किया जाता है। जो औरत नाक, नक्श, रूप, गुण रूप होती है उसे भी पद्मिनी की ही संज्ञा दी जाती है. पद्मिनी की संज्ञा भी चितौडग़ढ़ की रानी के नाम के आधार पर ही दी जाती है. 


अपूर्व सुंदरी महारानी पद्मावती या महारानी पद्मिनी सोलह हजार रानियों के साथ जौहर करने के लिए इतिहास में प्रसिद्ध  हैं .

महारानी पद्मिनी के जौहर को कथा बनाकर रची गई फिल्म पद्मावती के विरोध में पूरे भारत में आवाजे उठ रही हैं .लोगो का ये मानना हैं कि फिल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली द्वारा इतिहास को तोड़ मरोड़कर मसाला फिल्म की तरह प्रस्तुत किया गया हैं जो कि महारानी पद्मिनी जैसी सती का अपमान हैं .संजय लीला भंसाली  फिल्म को इतिहासकारों को दिखाने की बात कर रहे हैं .मगर इतिहासकारों में भी रानी पद्मिनी को लेकर काफी विरोधाभास हैं .रानी पद्मिनी के अस्तित्व और जौहर को स्वीकार लिया गया हैं मगर रानी पद्मिनी के जन्म स्थान और वंशावली को लेकर काफी दुविधा हैं,आज की इस पोस्ट में हम आपको रानी पद्मिनी का सबसे प्रमाणिक इतिहास बताने जा रहे हैं .इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें और रानी पद्मिनी के शौर्य और साहस से लोगो को परिचित करवाएं .

सबसे प्रमाणिक महारानी पद्मिनी का इतिहास | The Most Authentic History Of  Maharani Padmini


आइये जानते हैं महारानी पद्मिनी के बारें में इतिहासकार क्या कहते हैं ?

महारानी पद्मिनी की कहानी - महारानी पद्मिनी चित्तौड़  के महाराणा रतनसिंह की पत्नी थी , महारानी पद्मिनी अपनी सुंदरता के लिए विख्यात थी . रतनसिंह का शासनकाल मात्र एक वर्ष तक [1302-1303 ई०] तक ही रहा .

उस समय मुगल शासक अलाऊदीन खिलजी भारत में अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहा था,चित्तौड़ की सैनिक एवं व्यापारिक उपयोगिता उस समय बहुत ज्यादा थी , मध्य प्रदेश, संयुक्त प्रांत, सिन्ध आदि भागों के व्यापारिक मार्ग चित्तौड़ से होकर गुजरते थे,स्वाभाविक है कि अलाउद्दीन खिलजी जैसा सुल्तान ऐसे क्षेत्र पर अवश्य अधिकार प्राप्त करना चाहता था. इसमें कोई संदेह नहीं कि चित्तौड़ आक्रमण के लिए अलाउद्दीन का प्रमुख आशय राजनीतिक था, परंतु जब पद्मिनी की सुंदरता का हाल उसे मालूम हुआ तो उसको लेने की उत्कंठा उसमें अधिक तीव्र हो गयी.

सुल्तान अलाउद्दीन ने 1303 ईस्वी में चित्तौड़ पर आक्रमण किया और आठ महीने तक चित्तौड़ दुर्ग के बाहर घेरा डाले बैठा रहा,उसने राणा रतनसिंह के पास संधि प्रस्ताव भेजा और मेहमान बनकर उनके यंहा पहुंचा .मेहमान नवाजी के दौरान उसने किले के अंदर सैनिकों और राशन पानी की व्यवस्था का जायजा भी ले लिया. वापस लौटते समय उसने सीधे साधे राणा को अपने यंहा चलने का न्यौता दिया और अपने शिविर में ले जाकर बंदी बना लिया .

राणा को बंदी बनाकर उसने रानी पद्मिनी की मांग कर ली जिस पर राजपूत सरदारों को बहुत आक्रोश आया ,रानी पद्मिनी ने अपने ममेरे भाइयों गोरा और बादल को मदद के लिए बुलाया ,गोरा और बादल बहुत बहादुर लड़ाके थे .

गोरा बादल ने राजपूत योद्धाओं के साथ मिलकर व्यूह रचना कि और पालकियो में सैनिको को बैठाकर खिलजी को संदेश करवाया कि रानी को भेज रहे हैं पहले वो राणा से मिलेगी ,फिर उसके पास आएगी .अहंकारी सुल्तान गोरा बादल की चाल नहीं समझ पाया .गोरा बादल ने रतनसिंह को सुरक्षित करते ही हमले का इशारा कर दिया .

रतनसिंह को सुरक्षित किले में भेज दिया गया और गोरा बादल ने खिलजी की सेना में भयंकर तबाही मचाई ,घबराए खिलजी ने और सेना मंगवाकर फिर से चित्तौड़ पर बड़ा हमला किया . किले में रसद की कमी से जूझते राजपूतो ने शाका करने का निर्णय लिया .वंही महारानी पद्मावती ने निर्णय लिया कि सभी स्त्रियाँ अपने सतीत्व की रक्षा के लिए अग्नि में प्रवेश कर जौहर करेगी .

दुसरे दिन सोलह हजार रानियों के साथ महारानी पद्मिनी ने अग्नि स्नान कर लिया और पुरुष हर हर महादेव का नारा लगा केसरिया बाना पहन रण में जूझ गये . दुष्ट खिलजी ने चितौड़ पर कब्जा तो किया पर उसे वंहा कोई जिंदा इंसान नहीं मिला .

जैसलमेर के भाटी राजघराने की राजकुमारी थी रानी पद्मिनी 

रानी पद्मिनी के जन्म स्थान को लेकर कहा जाता हैं कि वो सिंहल द्वीप की राजकुमारी थी जो कि वर्तमान में श्रीलंका कहा जाता हैं . ये सब भ्रांति मलिक मुहम्मद जायसी कृत 'पद्मावत' नामक महाकाव्य के कारण   उत्पन्न  हुई हैं .जायसी ने लिखा है कि राजा गंधर्वसेन की सोलह हजार पद्मिनी रानियाँ थीं, जिनमें सर्वश्रेष्ठ रानी चंपावती थी, जो कि पटरानी थी. इसी चंपावती के गर्भ से पद्मावती या पद्मिनी का जन्म हुआ था.उसने नाथ योगियों के चमत्कारों के वशीभूत हो पद्मिनी और रतनसिंह/रत्नसेन  के प्रेम पर एक महाकाव्य की रचना कर  डाली .


पद्मिनी के जन्म स्थान का ज्ञान जायसी को नहीं था,मगर उसने बाकी सभी कथा चरित्रों और युद्ध का वर्णन और गोरा बादल के पराक्रम और खिलजी के आक्रमण को अपनी कथा में वर्णित किया हैं .मगर जैसलमेर के इतिहास से जुडी घटनाओ से रानी पद्मिनी के बारें में खुलासा होता हैं कि वो जैसलमेर के रावल पुनपाल जी की पुत्री थी .

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