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दिलीप सोनी नाचना का ब्लॉग .

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जैसलमेर में आयोजित जग विख्यात मरु मेले (DESERT FESTIVAL 2018) के पहले दिन रौचक प्रतियोगिताएं हुई। इन प्रतियोगिताओं में सबसे रोचक और प्रतिष्टि मरुश्री मिस्टर डेजर्ट का खिताब मनीष रामदेव को मिला, वहीं मिस मूमल वर्षा पंवार बनी। गौरतलब है कि मिस्टर डेजर्ट व मिस मूमल प्रतियोगिता डेजर्ट फेस्टिवल की सबसे बड़ी प्रतियोगिता है। इस प्रतियोगिता में भाग लेने के बाद प्रतिभागियों को बड़ा सम्मान मिलता है। यही कारण है कि मिस्टर डेजर्ट प्रतियोगिता में जैसलमेर ही नहीं बल्कि प्रदेशभर से यहां प्रतिभागी हिस्सा लेने आते है।

गुजरात में भाजपा की जीत और नरेंद्र मोदी की सफलता से खिसियाये कांग्रेस समर्थक और मीडिया वाले किस तरह का मनगढ़ंत विश्लेष्ण कर राहुल गांधी को हीरो बताने पर जुटे है ,व्यंग्य के माध्यम से केसरी सिंह सूर्यवंशी आपको बता रहे हैं ,ये लेख आप उनकी फेसबुक पोस्ट पे भी पढ़ सकते हैं .

अगर किसी को राहुल गांधी को पप्पू कहने से आपत्ति हो तो गूगल में सर्च करले - who is pappu in india.


जैसे कोई स्कूल के प्रिंसिपल के पप्पू बेटे का परीक्षा परिणाम अवलोकन हेतु उसी स्कूल के स्टाफ को लगाया गया है।
सर,...देखिए न पप्पू ने रोहित से supw में ज्यादा अंक लाये हैं।
और इधर गौर कीजिए,...ये स्वास्थ्य शिक्षा और कम्प्यूटर के नम्बर जुड़ने चाहिए... सर फिर अपना पप्पू पिछली बार से 23% आगे निकल जाएगा।
सर,.. रोहित नम्बर लाता है... मैथ्स और लैंगुएज में, और सब जानते हैं जिनका कोई फ़्यूचर नहीं है। सर लैंगुएज तो हटा ही देनी चाहिए।
सर,...आप देखिए पप्पू का ग्राफ फर्स्ट टेस्ट से एनुअल तक लगातार बढ़ता जा रहा है,... जबकि रोहित का ग्रोथ रेट वैसा नहीं है। सर,... ये कभी न कभी जरूर क्रॉस करेगा।
सर पप्पू का ओरल प्रेजेन्टेशन काफी अच्छा है जबकि रोहित का वेरी पुअर। सर फ़ेमस साइकोलॉजिस्ट #ब्रूनो ने कहा है कि रिटन से ओरल ही ज्यादा ऑथेंटिक है।
सर पप्पू का स्ट्राइक रेट बढ़ा है, रोहित का घटा है।
सर पप्पू अब बहुत अच्छा करने लगा है।
सर उसकी हैंडराइटिंग आपने देखी है...???
सर,..केवल कॉपी के मार्क्स ही तो सबकुछ नहीं होते... स्किल होनी चाहिए...और अपने पप्पू में वह है।
अरे... रोहित की मम्मी गंवार अनपढ़ है।

काली कलूटी..!

पर अभागा प्रिंसिपल तो जैसे इन तर्कों से ऊब गया हो, वह जानता है कि यह सब फालतू नकली तर्क हैं। रोहित के नेचुरल टेलेंट के आगे पप्पू की दयनीय हालत उससे छिपी नहीं है।
"एनी हाउ, पप्पू को फर्स्ट लाना है....!"
"सर,... रोहित के पेरेंट्स की क्लास ली जाए...!"
रोहित को स्कूल से ही निकलने पर मजबूर किया जाए....
सर गैम्स और एक्टिविटी के नम्बर,...इस बार प्रिंसिपल ने उसे ऐसा घूरा कि वह सहम गया।
बहरहाल समीक्षक भी जानते है कि बिना उनकी समीक्षा के काम "सर" का भी नहीं चलेगा।
सर को भी "सर" इनके पापा ने ही बनाया था और अब पप्पू ही उनका भावी सर है।
वैसे समीक्षकों जैसे टटपुँजियो को भी इंस्टीट्यूट में "इस लायक" बनाना पप्पू के मम्मी पापा की मेहरबानी का ही परिणाम है।

शादी के कुछ महीनों बाद से ही औरतो के शरीर में बदलाव आने शुरू हो जाते हैं और करीब पांच साल मे शरीर का ढांचा पूरी तरह बदल जाता हैं।आज की इस पोस्ट में हम जानेंगे ऐसे क्या कारण हैं जो महिलाओं के शरीर को बदलने के लिए उत्तरदायी हैं। द ओबेसिटी नामक जर्नल में प्रकाशित एक शोध  के अनुसार शादी के 5 साल के अंदर महिलाओं की बॉडी में तेजी से हॉर्मोनल बदलाव आने लगते हैं। इसके कारण 82% महिलाओं का वजन 5 से 10 किलो तक बढ़ जाता है। ऐसे में ब्रेस्ट, हिप्स, टमी और पैरों का आकार बड़ा होने लगता है। अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन की एक रिसर्च  के अनुसार इसकी सबसे बड़ी वजह तो अपने पार्टनर के साथ बनी न्यू रिलेशनशिप के कारण होने वाला हार्मोनल चेंजेस है।


महिलाओं का वजन बढ़ने की और भी हैं कई वजहें

  • शादी के बाद महिलाओं का स्लीपिंग पैटर्न बदल जाता हैं जिससे नींद पूरी नहीं हो पाती ,जिससे वजन बढ़ जाता हैं ।
  • शादी के महिलाओं में बदली हुई जीवनशैली के कारण कई हार्मोनल बदलाव होते हैं जिनकी वजह से उनका वजन बढ़ता हैं ।
  • शोधो के अनुसार बढती उम्र के साथ महिलाओं का मेटाबालिज्म रेट  कम हो जाता हैं , इससे फैट बर्निंग प्रोसेस स्लो हो जाता हैं ,जिसके कारण चर्बी बढ़ जाती हैं ।
  • शादी से पहले सुंदर दिखने और फिट रहने का सामाजिक दबाव होता हैं ,शादी होने के बाद यह प्रेशर कम हो जाता हैं जिसके कारण महिलाएं लापरवाह हो जाती हैं।
  • शादी के बाद नये परिवार के साथ एक ही जगह पर देर तक बैठकर बाते करना और ज्यादा टीवी देखने से शारीरिक क्रियाकलाप कम हो जाते हैं ,जिससे मोटापा बढ़ता हैं ।
  • शादी के बाद कई महिलाएं नये माहौल में ढल नहीं पाती ,जिससे तनाव हो जाता हैं और उससे मोटापा बढ़ता हैं ।
  • शादी के एक या दो साल में ही प्रेगनेंसी होने पर डाईट ,दवाओं और हार्मोनल चेंज के कारण शरीर की बनावट बदल जाती हैं ।
  • शादी के बाद महिलाएं लापरवाह हो जाती हैं ,ऐसे में उनका वजन बढने लगता हैं एक बार वजन बढने लगा तो फिर कंट्रोल करना मुश्किल होता हैं ।

ये लेख देश के मशहूर पत्रकार रवीश कुमार के फेसबुक पेज से लिया गया हैं,इसमें  हॉर्न बजाने की आदतों पर  बहुत ही अच्छा व्यंग्यात्मक विश्लेष्ण किया गया हैं। इसको  पूरा  पढियेगा मजा आएगा। रवीश कुमार की बोलने लिखने की एक अलग शैली व् अंदाज हैं वो आपको इस लेख में नजर आएगा ।



न्यूयार्क गया था। जब तक पुलिस की कार सायरन बजाते हुए दिख जाती थी। होटल के कमरे की खिड़की से देख रहा था कि कभी इस रास्ते से तो कभी उस रास्ते कोई पुलिस कार सायरन बजाते हुए चली आ रही है। लगता था कि पुलिस वाले दिन दोपहर सुबह शाम वीडियो गेम खेलने लगते हैं। पूरा शहर उस सायरन की आवाज़ के संदर्भ में वीडियो गेम लगता था। समझ नहीं आया कि पुलिस की कार इतना सायरन क्यों बजाती है। कई बार लगा कि सड़क के किनारे कार पार्क कर बैठे बैठे बोर हो जाते होंगे, इसलिए पुलिस वाले बीच सायरन सायरन खेलने लगते होंगे। पकड़म-पकड़ाई का खेल शुरू।

अक्सरहां सायरन की बारंबारता अर्थात फ्रीक्वेंसी तेज़ होती थी, हाउं हाउं, हाउं, हाउं जैसी ध्वनि पैदा की जाती थी मगर बीच में अचानक लंबी तान सुनाई देती थी। जैसे सियार ने हुंकार भरी हो। आरोह पर जाकर सायरन की आवाज़ ठहर जाती थी। अनूप जलोटा की तरह। जब तक ताली नहीं बजाएंगे तब तक हीरे-मोती के ई पर ही अटके रहते थे। ताली बजते ही जलोटा जी उतर आते थे। सायरनों के बीच पुलिस की जो मनोवृत्ति दिखती है उससे गुदगुदी होती है। यही बीमारी मेरे ग़ाज़ियाबाद आ गई है। पुलिस को नई जीप मिली हैं। उसके ऊपर फ्लैश ख़ूब है। थाने में सिपाही नहीं है मगर फ्लैश और सायरन से पुलिसिंग हो रही है। जनता को भी लगता है कि बड़ा काम हो रहा है।

पहले पुलिस वैन कहा गया फिर पीसीआर कहा गया अब पीआरवी पुलिस रिस्पांस व्हीकल कहा जाता है। नाम बदलते रहना चाहिए भले काम वही रहे। जब तब सायरन की आवाज़ आती रहती है। मुझे तो लगता है कि मेरी खिड़की पर ही पुलिस रहती है। कभी किसी को पुलिस के लिए रास्ता छोड़ते नहीं देखता, जैसे सबको पता है, इन्हें पहुंचना तो कहीं है नहीं, रास्ता देकर क्या होगा। पुलिस भी शायद इसी इत्मिनान से सायरन बजाती है कि देर हो जाए तो ही ठीक है। हथियारों से लैस अपराधी चले ही जाएं वरना कौन घड़ी-घड़ी ठांय-ठुई करेगा।

सोमवार रात देखा कि एक सुनसान सड़क पर सायरन बजने लगा। कई बार अकेले में जब डर लगता है तो लोग हनुमान चालीसा पढ़ने लगते हैं। वैसे ही कुछ लगा। हम भी ज़िम्मेदार हैं। पुलिस ड्यूटी पर रहती है तो नोटिस भी नहीं करते। हम मान कर चलते हैं कि पुलिस तो कहीं है नहीं। तो पुलिस भी क्या करे। जब तब सायरन बजाती रहे ताकि पता तो चले कि पुलिस है। हमारे
ग़ाज़ियाबाद में सायरन संगीत का नवोदय काल चल रहा है। उम्मीद है इसमें आगे चलकर निखार आएगा और संगीत कला के नए-नए रूप नज़र आएंगे।

भारत में हॉर्न भाषा की हमेशा उपेक्षा हुई है। यहां की सड़कों पर लोगों ने हॉर्न के अलग-अलग शब्द विकसित किए हैं। मैं ख़ुद को भारत का प्रथम हॉर्न भाषा विशेषज्ञ घोषित करता हूं। हॉर्न एक भाषा है। ग़ाज़ियाबाद के लोग हॉर्न ख़ूब बजाते हैं। यहां हर वक्त हॉर्न प्रतियोगिता चलती रहती है। सुबह-सुबह ख़ाली सड़क पर कुछ वाहन चालकों को कई मीटर तक हॉर्न बजाते सुना है, मानो एलान कर रहे हों कि हम आ रहे हैं, अभी कोई और न आए। तभी कोई ऑटो वाला झरझराते हुए गुज़र जाता है। ऑटो का शरीर ही अपने आप में हॉर्न है। जैसे नहाने के बाद कुत्ता बाल झाड़ता है वैसा ही ध्वनि बोध ऑटो की झरझराहट से होता है। ऑटो रिक्शॉ की कंपनी शैली अपने आप में एक हॉर्न है मगर ऐसा नहीं है कि ऑटो में हॉर्न नहीं होता है। ऑटो की झरझराहट के बीच उसका हॉर्न सुनकर ऐसे लगता है कि जैसे ऑटो से कोई स्कूटर निकल रहा हो।

कुछ हॉर्न की भाषा बेहद संक्षिप्त होती है। लगता है ट्रैफिक क्लियर करने के लिए नहीं बल्कि चेक करने के लिए बजाया गया है कि बज रहा है या नहीं। कई बार लोग बार-बार चेक करते हैं। एक बार तो बज गया, क्या दोबारा बजेगा, बस बजा दिया। हॉर्न की आवाज़ दूसरे हॉर्न की आवाज़ को चीरती है, फिर उस चीरे में कोई और हॉर्न की आवाज़ चीरा लगाती है। इसतरह से सरदर्द का जो सार्वजनिक माहौल बनता है। एक स्कूटर वाला इस तरह से हॉर्न बजाते जा रहा है जैसे उसका एक्सलेटर हॉर्न में ही लगा हुआ है। ट्रैफिक जाम में लोग अपना पांव एक्सलेटर से हटाकर हॉर्न पर रख देते हैं।

हॉर्न की भाषा के शोधार्थी सुन सकेंगे कि यहां की सड़कों पर हॉर्न सुनकर एकदम से सड़क के किनारे नहीं हो जाते। उन्हें याद आता है कि उनके आगे भी तो कोई कार चल रही है। पहले उसे हटाते हैं। बस पीछे वाला आगे के लिए हार्न बजा रहा है और उसके पीछ वाला उसके लिए। इस क्रम में हॉर्न चेन बनता है। कोई हटता नहीं है मगर हटाने के लिए सब हॉर्न बजाते हैं। स्कूल बसों के ब्रेक ने अपना अलग हॉर्न संस्कृति विकसित कर लिया है। स्टॉप पर इस तरह बसें ब्रेक लगाती हैं कि आप दूर खड़े होकर भी महसूस कर सकते हैं कि टायर के नीचे चले गए हैं और फिर नीचे-नीचे ग़ाज़ियाबाद से ही निकल लिए हैं।

कुछ हॉर्न मुझे मुक्ति बोध की लंबी कविताओं की मानिंद सुनाई देते हैं। कुछ हॉर्न को सुनकर लगता है कि कोई सड़क पर क्षणिकाएं लिख रहा है। हाइकू लिख रहा है। कुछ हॉर्न ऐसे होते हैं जैसे किसी ने नज़र बचाकर पच से थूक दिया हो। एकबार पीं बोलकर चुप हो जाते हैं। बहुत से हॉर्न में गुस्सा है तो मनुहार भी है। पां पां वाले हॉर्न तो मुझे वाह-वाह जैसे लगते हैं। कीं कीं वाले हॉर्न सुनकर लगता है कि बंदा पिनका हुआ है। मैं हॉर्न सुनकर बता सकता हूं कि कौन ओवरटेक करने के लिए बजा रहा है और कौन किनारे किनारे मस्ती में चलता हुआ बजा रहा है।

लाउडस्पीकर भारत के शहरों का स्थायी दर्द है। लगता है कि सभी धर्मों के ईश्वर ने आम भक्तों तक संदेश भिजवाया है कि मुझ तक पहुंचना है तो लाउडस्पीकर बजाओ। बस सब अपनी सुनाने लग जाते हैं। कई बार लाउडस्पीकर इस तरह से बजाए जाते हैं जैसे ईश्वर को चुनौती दी जा रही हो। पहले हमारी आवाज़ सुनो बलिहारी वरना हम पड़ोसी के कान का चदरा देइब फाड़ी। कई लाउडस्पीकर बोलते बोलते मिमियाने लगते हैं, फिर अचानक तेज़ हो जाते हैं। जैसे इन्हें पता है पड़ोसी जैसे ही झपकी लेगा, उसे ज़ोर से जगा देना है। न भगवान को सोने देना है न पड़ोसी को। आज कल त्योहार के मौके पर शोभा यात्रा निकलती है। यह यात्रा आपके मोहल्ले की सड़क पर लंबे वक्त तक ठहरी रहती है। भर भर रिक्शा लाद कर लाउडस्पीकर लिए चलते हैं। भक्तगण इस आवाज़ से अपने लिए एकांत का स्पेस क्रिएट करते होंगे।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड। यह पहला ऐसा बोर्ड है जो सूचना देने का काम करता है मगर नाम नियंत्रण का रखता है। इसी के अनुसार ग़ाज़ियाबाद की हवा देश में सबसे ज़हरीली है। अख़बारों ने ऐसे इतरा कर लिखा है कि अगले साल ज़हरीली की जगह छैल-छबीली लिख देंगे।

ज़हर अब जानलेवा नहीं रहा। ज़हर एक मिठास है। खांस है। फांस है। ये वो ज़हर नहीं कि पीते ही मार दिया। ये वो ज़हर हैं जो हमारे भीतर घर बसाते हैं। क्यूट प्वाइज़न। वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण का पर्यटन करना हो तो प्लीज़ ग़ाज़ियाबाद आएं। नाक और कान एक साथ फोड़वाएं। आंखों में जलन होगी, इसकी गारंटी है, भूपेंद्र का गाना सुनते हुए निकल जाएं कि इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यों है।

मूल लेख का लिंक - रवीश का पेज  अगर आपको अच्छा लगा हो तो शेयर करना मत भूलियेगा .

बिजली विभाग में लाइनमैन के लिए सबसे मुश्किल काम होता हैं बिजली के खंभे पर चढ़ना ,वर्षों से इसके लिए सीढ़ी का सहारा लिया जाता रहा हैं या बंदर की तरह खंभे को पकड़कर ऊपर चढ़ना होता था . सीढ़ी को एक  जगह से दूसरी जगह लाना ले जाना भारी पड़ता था और एक आदमी की भी साथ में जरूरत रहती थी ,जबकि बंदर की तरह सिर्फ वही लोग चढ़ पाते जिनका शरीर फिट हो .इसी परेशानी ने एक नए जुगाड़ का जन्म करा दिया पिछले कुछ महीनों से इस जुगाड़ का राजस्थान में सभी बिजलीघरों में खूब प्रयोग हो रहा हैं .

Pole Climber
Pole Climber  के सहारे बिजली के खंभे पे चढ़ता बिजलीघर कर्मचारी 
इस जुगाड़ में लोहे के बने खांचों पर फाइबर और प्लास्टिक के चप्पल फिट कर दिए गये हैं .इस Pole Climber के आगे के हिस्से में एक खांचा बनाया गया हैं ,जो पोल पर फिट हो जाता हैं .एडी पर वजन रखने पर Pole Climber बिजली के पोल से अटक जाता हैं,और लाइनमेन खंभे पे इस तरह चढ़ जाता हैं जैसे कि सीढियां चढ़ रहा हो .एडी को ऊपर उठाते ही अगला हिस्सा फ्री हो जाता हैं .

बताया जा रहा हैं कि Whats app पे देखे एक विडियो में ये जुगाड़ देखने के बाद बिजली विभाग के एक लाइनमेन ने ये जुगाडू जूते बनवाए ,जिसके बाद पूरे प्रदेश के लाइनमेन इन्हें उपयोग में ले रहे हैं .इन्हें पहनकर आसानी से 25 से 30 फीट ऊँचे खंभे पर चढ़ा जा सकता हैं .

pole climber cheap

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उड़ीसा के पूरी समुद्र तट के किनारे एक सेंड आर्टिस्ट सुदर्शन पटनायक ने ने मिस वर्ल्ड 2017 मानुषी छिल्लर के लिए रेत से कलाकृति बनाकर बधाई दी हैं .

रेत से कलाकृतियां बनाने में माहिर  सुदर्शन पटनायक ने विश्व सुंदरी का खिताब जीतने वाली मानुषी छिल्लर  का चेहरा पूरी तट पर  उकेरते हुए आकृति बनाकर शुभकामनाएं दी. सुदर्शन ने टि्वटर पर यह आकृतियां साझा करते हुए लिखा, ‘‘मानुषी छिल्लर को विश्व सुंदरी 2017 का खिताब जीतने पर बधाई देने के लिए पुरी तट पर मेरी रेत कला. भारत को तुमने गौरवान्वित किया.’’ समुद्र तट पर बनाई आकृतियों में मानुषी छिल्लर का चेहरा नजर आ रहा है और उनके सिर पर विश्व सुंदरी का ताज सजा है. सिर के पीछे तिरंगा बना है. चेहरे के पास अंग्रेजी में लिखा है बधाई हो मानुषी छिल्लर और नीचे विश्व सुंदरी 2017 लिखा है.


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